ना उम्मीदों के साये में

ना उम्मीदों के साये में उम्मीद लगाए बैठे हैं
पंख हमारे भी आएंगे,फिर आसमा में उड़ जाएंगे।।

 शहरों की चकाचौंध में, तन्हाई अपनी छुप जाती है
इन शहरों की भीड-भाड़ में, नहीअपनी कोई परछाई है।
अपने भी दिन आएंगे,ये सपने सजाए बैठे हैं
ना उम्मीदों के साये में उम्मीद लगाए बैठे हैं।।

हर दिन कोई अपना बनता,अपना होता पराया
कोई करता रौशन जीवन,कोई करता अंधियारा
सबके अपने -अपने हित हैं, सबकी अपनी मजबूरी
शहरों की इस भाग-दौड़ में,सब कुछ है जरूरी
इस अविश्वास की दुनियाँ में विश्वास लगाए बैठे हैं
ना उम्मीदों के साये में उम्मीद लगाए बैठे हैं।।

ना उम्मीद की कोई वजह नही,जब खुद ही खुद के साथ हैं
कोई तो मेरे जैसा होगा जिसको खुद पे विश्वास है
अनिश्चितताओं के सागर में आश लगाए बैठे हैं
ना उम्मीदों के साये में उम्मीद लगाए बैठे हैं।।
🙏🙏अखिलेश🙏🙏







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