Posts

बदलती जिंदगी

हिमालय की तराई में हमारा एक खूबसूरत सा गांव है। हिमालय की ऊँची ऊंची चोटियां, घने जंगल और उन जंगलों से निकलती नदियाँ ये सब मिलकर एक ऐसा आकर्षक उत्पन्न करती है कि ब्रम्हांड का हर प्राणी यहां खिंचा चला आता है। गांव के लोग खाली पड़ी जमीन पर खेती करते हैं। नदियों से सिंचाई हो जाती है। कुछ लोग नदी में मछली पकड़कर अपना जीवन यापन करते हैं। गांव में ज्यादा सम्पनता तो नहीं लेकिन किसी चीज की कमी भी नहीं है। लोगों का गुजारा चल रहा है। बरसात के दिनों में कभी कभी बाढ़ आ जाती है, जिससे फसलें बर्बाद हो जाती है और मवेशी बह जाते हैं। इसलिए बरसात के मौसम शुरू होने के पहले ही लोग बाढ़ के लिए तैयार रहते हैं ताकि कम नुकसान हो। बारिश का मौसम खत्म होते हीं सब पहले जैसा सामान्य हो जाता है और लोग खुशी खुशी रहने लगते हैं। सब कुछ सामान्य रूप से चल रहा था कि हमारे गांव पर सरकार की नजर पड़ी। यहां से बहने वाली नदी पर एक बड़ी पनबिजली परियोजना लगाई जानी थी। लोगों को बताया गया कि इस परियोजना से उन्हें भी खूब लाभ मिलेगा। परियोजना से उत्पन्न बिजली से गांव में बिजली दी जाएगी और पहाड़ी पर बनने वाले डैम में मछली पालन किया जाएगा। ज...
हौसलों को कुछ यूँ , उड़ान दी जाए, कि,आंखों में ख्बाब  हो पर नींद न आए। रास्तों के साथ दोस्ती कुछ यूँ निभाई जाए, कि, वर्षों चलते रहें पर थकान न आए। सफर में दोस्त कुछ यूँ बनाये जाएं, कि, मुश्किल वक्त हो पर साथ खड़े नजर आएं। जिंदगी में कुछ काम यूँ किए जाएं, कि मर जाने के बाद भी जिंदा नजर आएं।।

क्या कहें

ख्बाब में आकर रात भर जगाते हो क्या कहें। पास आकर भी पास नहीं आते हो क्या कहें।। नजरें झुका कर कुछ यूँ मुस्कुराते हो क्या कहें। इशारो इशारों में सोई  हसरतें जगाते हो क्या कहें।। दूर रहकर मुझे सताते हो क्या कहें। खामोश रहकर भी एहसास जगा जाते हो क्या कहें।। यूँ तो तुम भी अलग और मैं भी हूँ तन्हा यहाँ, पर, मेरी तन्हाई में अपनी यादों की भीड़ छोड़ जाते हो क्या कहें।। Akhilesh Adarshi

तुम्हारी तरह

            तुम पास तो नहीं,   शायद दूर हीं हो आसमान के उस तारे की तरह, जो रात के अंधेरे में, अपने होने का एहसास तो कराती है लेकिन सुबह होते ही सूरज की रौशनी के पीछे छुप जाती है शायद उसे भी धूप में जलने का डर हो, तुम्हारी तरह।। कभी लगता है कि तुम सागर के उन लहरों की तरह हो जो दूर से बाहें फैलाए, सागर  के किनारों से  मिलने आती हैं अपने होने का एहसास कराती हैं और फिर लौट जाती हैं शायद लहरों को भी किनारों को तड़पाने में मजा आता होगा तुम्हारी तरह।।

दूर तलक चलना है मुझे

दूर तलक चलना है मुझे खुद ही गिरना और सम्हलना है मुझे किसी के काबिल न सही खुद ही खुद के काबिल बनना है मुझे।। चलो आज फिर खुद को जरा समझा तो दूँ न कर फिकर किसी की ये बता तो दूँ बन जाऊँ मैं तूफ़ां किसी समंदर का जो, खुद अपनी ऊँचाई तक पहुचकर गिरना है मुझे दूर तलक चलना है मुझे।।                   अखिलेश

खुद के बनाये दायरे में, खुद ही सिमट रहा हूँ

खुद के बनाये दायरे में, खुद ही सिमट रहा हूँ बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।।  अपने बनाये बंधनो से खुद ही बंधा हुआ  हर दिन अपने गुमान से खुद ही झगड़ता हुआ  चल रहा था जिस राह पर,वो राह बदलता हुआ कभी गुमान था खुद पे, अब खुद पे तरस रहा हूँ बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।। सबसे आगे निकलने की होड़ में, छोड़े थे कुछ अपने सपने उन सपनों को ढूंढ़ कर फिर से पिरो रहा हूँ बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।।      अखिलेश

दिल्ली की सर्द भरी रात में

दिल्ली की सर्द भरी रात में सड़क किनारे चलते हुए हाथों को सुन्न करने वाली हवाओं को महसूस कर किसी की याद आती है! उसके साथ बिताए हर एक पल, खुला खुला शरीर, मन चंचल उसके आने की गर्म आहट, उसके होने पर ठंडी हवाओं की चाहत क्या वो बरसात थी?,नहीं! शायद वो गर्मी की रात थी! अखिलेश