क्या कहें

ख्बाब में आकर रात भर जगाते हो क्या कहें।
पास आकर भी पास नहीं आते हो क्या कहें।।

नजरें झुका कर कुछ यूँ मुस्कुराते हो क्या कहें।
इशारो इशारों में सोई  हसरतें जगाते हो क्या कहें।।

दूर रहकर मुझे सताते हो क्या कहें।
खामोश रहकर भी एहसास जगा जाते हो क्या कहें।।

यूँ तो तुम भी अलग और मैं भी हूँ तन्हा यहाँ,
पर, मेरी तन्हाई में अपनी यादों की भीड़ छोड़ जाते हो क्या कहें।।
Akhilesh Adarshi





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