बदलती जिंदगी
हिमालय की तराई में हमारा एक खूबसूरत सा गांव है। हिमालय की ऊँची ऊंची चोटियां, घने जंगल और उन जंगलों से निकलती नदियाँ ये सब मिलकर एक ऐसा आकर्षक उत्पन्न करती है कि ब्रम्हांड का हर प्राणी यहां खिंचा चला आता है। गांव के लोग खाली पड़ी जमीन पर खेती करते हैं। नदियों से सिंचाई हो जाती है। कुछ लोग नदी में मछली पकड़कर अपना जीवन यापन करते हैं। गांव में ज्यादा सम्पनता तो नहीं लेकिन किसी चीज की कमी भी नहीं है। लोगों का गुजारा चल रहा है। बरसात के दिनों में कभी कभी बाढ़ आ जाती है, जिससे फसलें बर्बाद हो जाती है और मवेशी बह जाते हैं। इसलिए बरसात के मौसम शुरू होने के पहले ही लोग बाढ़ के लिए तैयार रहते हैं ताकि कम नुकसान हो। बारिश का मौसम खत्म होते हीं सब पहले जैसा सामान्य हो जाता है और लोग खुशी खुशी रहने लगते हैं।
सब कुछ सामान्य रूप से चल रहा था कि हमारे गांव पर सरकार की नजर पड़ी। यहां से बहने वाली नदी पर एक बड़ी पनबिजली परियोजना लगाई जानी थी। लोगों को बताया गया कि इस परियोजना से उन्हें भी खूब लाभ मिलेगा। परियोजना से उत्पन्न बिजली से गांव में बिजली दी जाएगी और पहाड़ी पर बनने वाले डैम में मछली पालन किया जाएगा। जिसमे गांव के लोग भागीदारी करेंगे। यहां तक सड़के बनाई जाएगी जिससे पर्यटन उधोग को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। शहरों तक पहुचना आसान हो जाएगा जिससे शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होंगी। सभी लोग खुश थे क्योंकि सबकी जिंदगी बदलने वाली थी। परियोजना पर काम शुरू हुआ और 15-20 वर्षों में डैम बनकर तैयार हो गया। जो लोग किशोर थे अब युवा बन गए थे और जो बुजुर्ग थे वो अब आंखे मूंद चुके थे।
खैर इस डैम के पूरा होने से जहां हमारे गांव वाले खुश थे वहीं नदी के ऊपरी क्षेत्र में रहने वाले लोग काफी दुखी थे। क्योंकि जलभराव से उनका गांव डूब गया था। हालांकि सरकार ने उन्हें क्षतिपूर्ति देने और किसी अन्य जगह बसाने का वादा किया था लेकिन सरकारी बाबू और सरकारी कागज के चक्कर ने लोगों को ऐसा उलझाया कि लोग थक हारकर शहरों में पलायन कर गए। उनका न केवल घर डूबा था बल्कि उनके नाते रिश्तेदार सब छूट गए थे। अपने देवी देवता, समाज, संस्कृति यहां तक कि अपने सपने तक को उन्हें छोड़ना पड़ा और एक अंधकारमय और अनिश्चित जीवन जीने को विवश होना पड़ा।।
इन सब परेशानियों से अलग हमारा गांव अब अधिक खुशहाल हो गया था। डैम देखने और यहाँ बोटिंग करने के लिए शहरों से काफी लोग आने लगे थे । आस-पास अनेक होटल खुल गए थे जिसमें स्थानीय लोगों को छोटी मोटी नौकरी मिलने लगी थी। डैम के निचले इलाको में गांव वालों ने अनेक तालाब बना लिए थे जहां मछली पालन किया जा रहा था। गांव की समृद्धि युवाओं के हाव-भाव मे स्पष्ट होने लगा था। सब कुछ सही चल रहा था कि एक दिन हल्के भूकंप के झटके के साथ डैम का बांध टूट गया। भूकंप के झटकों के कारण अपने पक्के बहुमंजिला इमारतों से लोग बाहर निकले हुए थे और दिन के उजाले में टूटे डैम से पानी की तेज धारा के साथ आती मौत को देख रहे थे। लोगों को समझ नही आ रहा था कि अब क्या करें। अब तो गांव में वैसा कोई व्यक्ति भी नहीं था जिसने कभी नदी की बाढ़ भी देखी हो। अगर कोई होता, तो इस कठिन समय मे लोगों को दिलासा देता कि ये उफनती नदी का गुस्सा है जो कुछ देर में शांत पड़ जायेगा और सब कुछ सामान्य हो जाएगा।।
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