खुद के बनाये दायरे में, खुद ही सिमट रहा हूँ

खुद के बनाये दायरे में, खुद ही सिमट रहा हूँ
बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।।

 अपने बनाये बंधनो से खुद ही बंधा हुआ
 हर दिन अपने गुमान से खुद ही झगड़ता हुआ
 चल रहा था जिस राह पर,वो राह बदलता हुआ
कभी गुमान था खुद पे, अब खुद पे तरस रहा हूँ
बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।।

सबसे आगे निकलने की होड़ में,
छोड़े थे कुछ अपने सपने
उन सपनों को ढूंढ़ कर फिर से पिरो रहा हूँ
बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।।

     अखिलेश

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