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तुम्हारी तरह

            तुम पास तो नहीं,   शायद दूर हीं हो आसमान के उस तारे की तरह, जो रात के अंधेरे में, अपने होने का एहसास तो कराती है लेकिन सुबह होते ही सूरज की रौशनी के पीछे छुप जाती है शायद उसे भी धूप में जलने का डर हो, तुम्हारी तरह।। कभी लगता है कि तुम सागर के उन लहरों की तरह हो जो दूर से बाहें फैलाए, सागर  के किनारों से  मिलने आती हैं अपने होने का एहसास कराती हैं और फिर लौट जाती हैं शायद लहरों को भी किनारों को तड़पाने में मजा आता होगा तुम्हारी तरह।।

दूर तलक चलना है मुझे

दूर तलक चलना है मुझे खुद ही गिरना और सम्हलना है मुझे किसी के काबिल न सही खुद ही खुद के काबिल बनना है मुझे।। चलो आज फिर खुद को जरा समझा तो दूँ न कर फिकर किसी की ये बता तो दूँ बन जाऊँ मैं तूफ़ां किसी समंदर का जो, खुद अपनी ऊँचाई तक पहुचकर गिरना है मुझे दूर तलक चलना है मुझे।।                   अखिलेश

खुद के बनाये दायरे में, खुद ही सिमट रहा हूँ

खुद के बनाये दायरे में, खुद ही सिमट रहा हूँ बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।।  अपने बनाये बंधनो से खुद ही बंधा हुआ  हर दिन अपने गुमान से खुद ही झगड़ता हुआ  चल रहा था जिस राह पर,वो राह बदलता हुआ कभी गुमान था खुद पे, अब खुद पे तरस रहा हूँ बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।। सबसे आगे निकलने की होड़ में, छोड़े थे कुछ अपने सपने उन सपनों को ढूंढ़ कर फिर से पिरो रहा हूँ बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।।      अखिलेश

दिल्ली की सर्द भरी रात में

दिल्ली की सर्द भरी रात में सड़क किनारे चलते हुए हाथों को सुन्न करने वाली हवाओं को महसूस कर किसी की याद आती है! उसके साथ बिताए हर एक पल, खुला खुला शरीर, मन चंचल उसके आने की गर्म आहट, उसके होने पर ठंडी हवाओं की चाहत क्या वो बरसात थी?,नहीं! शायद वो गर्मी की रात थी! अखिलेश

तेरे आने के साथ जो बंधी थी उम्मीदें

तेरे आने के साथ जो बंधी थी उम्मीदें, बिखरती रही वो दिन गुजरने के साथ।।                हर बार की तरह इस बार भी हमने,                सजाए थे सपनों की एक अच्छी सी दुनियाँ।                पाना था सब कुछ जिसमे, संग तुम्हारे,                मेरी हर सफलता पे, नाम,  तुम्हारा होना था                मगर ये ख्याहिशों की डोली भी उठ न सकी,                ख्वाब मिटते गए शाम ढलने के साथ।। ऐसा नहीं है कि तू विल्कुल बेवफा है दिए हैं तुमने भी कुछ अच्छे पल जिया है हमने भी तुम्हारे हसीन लम्हों को कुछ सफलताएं भी पाई हैं हमने संग तुम्हारे लेकिन सजाये सपने बचा न सका सुबह निकलने के साथ।।                अब जब जाना है तुम्हे,               अपने यादो की बारात छोड़कर,    ...

दिल भी तो सागर है,भावनाओं का

दिल भी तो सागर है,भावनाओं का इसमें भी लहरे आती हैं मन से टकराती हैं और टूटकर तरह बिखर जाती हैं। फिर से उठती हैं लहरो की तरह आशाएं पूरे उल्लास के साथ आगे बढ़ती है लगता है सारी खुशियों को समेट लिया है इसने, लेकिन फिर किसी पत्थर से टकराकर गम के दरिया में डूब जाती है। कुछ पल शांत रहती है शायद मौसम बदलने के कारण लेकिन थोड़ी सी मुस्कुराहट के साथ फिर से भावनाएं उमड़ने लगती है एक नई उम्मीद के साथ शायद सुनामी समाप्त हो गया है।। अखिलेश

तेरा आना भी क्या आना है

तेरा आना भी क्या आना है ये दिखावा है या छलावा है।। न खुद से मिलना है ,न किसी और से मिलाना है मुझे तो ये लगता  बस छलावा है।। औरों के लिए हूर हो तुम,मेरे लिए मगरूर हो तुम, सारे जग में मशहूर तेरा पहनावा है तेरा आना तो बस एक छलावा है।। वो भी क्या दिन थे जब तुमसे मिलने की मिन्नतें किया करता था, दिन रात तुम्हे पाने की धुन में मगन रहा करता था। आज तेरा इस तरह मिलना भी एक भुलावा है तेरा आना तो बस एक छलावा है।। तू मिल के न मिल पाई ऐसा लग रहा है तुझे पाने की ललक मुझमें और बढ़ रहा है तेरा सर झुका कर नजरें चुराना, कुछ बताता भी है ये प्यार है  तेरा या कोई और इशारा भी है तेरा आना भी क्या आना है, ये दिखावा है या छलावा है।। अखिलेश आदर्शी