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खुद के बनाये दायरे में, खुद ही सिमट रहा हूँ

खुद के बनाये दायरे में, खुद ही सिमट रहा हूँ बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।।  अपने बनाये बंधनो से खुद ही बंधा हुआ  हर दिन अपने गुमान से खुद ही झगड़ता हुआ  चल रहा था जिस राह पर,वो राह बदलता हुआ कभी गुमान था खुद पे, अब खुद पे तरस रहा हूँ बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।। सबसे आगे निकलने की होड़ में, छोड़े थे कुछ अपने सपने उन सपनों को ढूंढ़ कर फिर से पिरो रहा हूँ बाहर की आजादी देखकर, मैं भी तड़प रहा हूँ।।      अखिलेश

दिल्ली की सर्द भरी रात में

दिल्ली की सर्द भरी रात में सड़क किनारे चलते हुए हाथों को सुन्न करने वाली हवाओं को महसूस कर किसी की याद आती है! उसके साथ बिताए हर एक पल, खुला खुला शरीर, मन चंचल उसके आने की गर्म आहट, उसके होने पर ठंडी हवाओं की चाहत क्या वो बरसात थी?,नहीं! शायद वो गर्मी की रात थी! अखिलेश

तेरे आने के साथ जो बंधी थी उम्मीदें

तेरे आने के साथ जो बंधी थी उम्मीदें, बिखरती रही वो दिन गुजरने के साथ।।                हर बार की तरह इस बार भी हमने,                सजाए थे सपनों की एक अच्छी सी दुनियाँ।                पाना था सब कुछ जिसमे, संग तुम्हारे,                मेरी हर सफलता पे, नाम,  तुम्हारा होना था                मगर ये ख्याहिशों की डोली भी उठ न सकी,                ख्वाब मिटते गए शाम ढलने के साथ।। ऐसा नहीं है कि तू विल्कुल बेवफा है दिए हैं तुमने भी कुछ अच्छे पल जिया है हमने भी तुम्हारे हसीन लम्हों को कुछ सफलताएं भी पाई हैं हमने संग तुम्हारे लेकिन सजाये सपने बचा न सका सुबह निकलने के साथ।।                अब जब जाना है तुम्हे,               अपने यादो की बारात छोड़कर,    ...

दिल भी तो सागर है,भावनाओं का

दिल भी तो सागर है,भावनाओं का इसमें भी लहरे आती हैं मन से टकराती हैं और टूटकर तरह बिखर जाती हैं। फिर से उठती हैं लहरो की तरह आशाएं पूरे उल्लास के साथ आगे बढ़ती है लगता है सारी खुशियों को समेट लिया है इसने, लेकिन फिर किसी पत्थर से टकराकर गम के दरिया में डूब जाती है। कुछ पल शांत रहती है शायद मौसम बदलने के कारण लेकिन थोड़ी सी मुस्कुराहट के साथ फिर से भावनाएं उमड़ने लगती है एक नई उम्मीद के साथ शायद सुनामी समाप्त हो गया है।। अखिलेश

तेरा आना भी क्या आना है

तेरा आना भी क्या आना है ये दिखावा है या छलावा है।। न खुद से मिलना है ,न किसी और से मिलाना है मुझे तो ये लगता  बस छलावा है।। औरों के लिए हूर हो तुम,मेरे लिए मगरूर हो तुम, सारे जग में मशहूर तेरा पहनावा है तेरा आना तो बस एक छलावा है।। वो भी क्या दिन थे जब तुमसे मिलने की मिन्नतें किया करता था, दिन रात तुम्हे पाने की धुन में मगन रहा करता था। आज तेरा इस तरह मिलना भी एक भुलावा है तेरा आना तो बस एक छलावा है।। तू मिल के न मिल पाई ऐसा लग रहा है तुझे पाने की ललक मुझमें और बढ़ रहा है तेरा सर झुका कर नजरें चुराना, कुछ बताता भी है ये प्यार है  तेरा या कोई और इशारा भी है तेरा आना भी क्या आना है, ये दिखावा है या छलावा है।। अखिलेश आदर्शी

खुद ही खुद से नाराज हूँ मैं

खुद से हैरान हूँ मैं, खुद से परेशान हूँ मैं। खुद ही खुद की न सुनता, खुद से आज नाराज हूँ मैं।। दूसरों पर आँखे बंद कर भरोसा करना फिर धोखा खाना और निराश हो जाना । इन सिलसिलों से हताश हूँ मैं खुद से आज नाराज हूँ मैं।। सबको अपने जैसा समझना सच बोलना और सच सुनने की आश रखना उन आशाओं के टूटने से नाशाद हूँ मैं आज खुद ही खुद से नाराज हूँ मैं।। अपनी बातें सबसे कहना सबकी बातों पे चुप रहना बोल बोल कर वाचाल हूँ मैं खुद ही खुद से नाराज हूँ मैं।। खुद को कितनी बार बताया चुप रहने का पाठ पढ़ाया समझा समझा कर परेशान हूँ मैं खुद ही खुद से नाराज हूँ मैं।। 😢अखिलेश😢

ना उम्मीदों के साये में

ना उम्मीदों के साये में उम्मीद लगाए बैठे हैं पंख हमारे भी आएंगे,फिर आसमा में उड़ जाएंगे।।  शहरों की चकाचौंध में, तन्हाई अपनी छुप जाती है इन शहरों की भीड-भाड़ में, नहीअपनी कोई परछाई है। अपने भी दिन आएंगे,ये सपने सजाए बैठे हैं ना उम्मीदों के साये में उम्मीद लगाए बैठे हैं।। हर दिन कोई अपना बनता,अपना होता पराया कोई करता रौशन जीवन,कोई करता अंधियारा सबके अपने -अपने हित हैं, सबकी अपनी मजबूरी शहरों की इस भाग-दौड़ में,सब कुछ है जरूरी इस अविश्वास की दुनियाँ में विश्वास लगाए बैठे हैं ना उम्मीदों के साये में उम्मीद लगाए बैठे हैं।। ना उम्मीद की कोई वजह नही,जब खुद ही खुद के साथ हैं कोई तो मेरे जैसा होगा जिसको खुद पे विश्वास है अनिश्चितताओं के सागर में आश लगाए बैठे हैं ना उम्मीदों के साये में उम्मीद लगाए बैठे हैं।। 🙏🙏अखिलेश🙏🙏